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happy women's day

बंजर ज़मीं पर कब भला शजर लगता है ख़्वाबों से ज़माना मेरे बे-ख़बर लगता है कैसे पार कर दूंँ ज़माने की दहलीज़ को बेटी हूंँ जनाब! मुस्कुराने से भी डर लगता है।                  समाज की हक़ीक़त का आईना मैं ही तो हूंँ                  सानिया, कल्पना और शाईना मैं ही तो हूंँ                  फिर क्यों नहीं ज़माने पर मेरी बातों का असर लगता है                  बेटी हूंँ जनाब! मुस्कुराने से भी डर लगता है। चर्चे आजकल मेरी अस्मत के, ख़बर में भी है मुझे घूरकर देखने वाले,बहन तेरे घर में भी है बड़ा ही ना -समझ मुझे तू ऐ बशर! लगता है बेटी हूंँ जनाब! मुस्कुराने से भी डर लगता है।                 लोगों! मेरी छोटी सी बात को शामत ना समझा जाए                 पढ़ने का हक़ मांगती हूंँ, इसे बग़ावत ना समझा जाए               ...