Posts

Showing posts from May, 2021

તું તા કમાલ કરી વધે

તું તા કમાલ કરી વધે મલ્યા કિસ્મતે, બીછડ્યા અચાનક વાયદા મડે તોડી વધે પ્રેમ જે નામ તે દગો કરી વધે તું તા કમાલ કરી વધે હસરત છડી..ફીતરત ફરી પાગલ થઇ પાછળ ફરી જિંધગી મુજી બેહાલ કરી વધે  તું તા કમાલ કરી વધે સમય વેડફ્યા, કરમ બગાડ્યા તહોમત લગાઈ બદનામ કરી વધે તું તા કમાલ કરી વધે મજબૂરી જે નામ તે, છૂટકારો કરી વધે હસી મુજી દુશ્વાર કરી વધે તું તા કમાલ કરી વધે શમણા વતાય સ્વર્ગ સમા દોજખ જેડા હાલ કરી વધે તું તા કમાલ કરી વધે  
ये दुनिया वही पुरानी है हर रोज नया सवेरा है.. कही लाशों का तमासा है कहीं गिद्धों का डेरा है।। कोई चल निकला है मंजिल को पर राहों में अंधेरा है.. कही रोटी छीन गया मेरा कहीं सुना थाली तेरा है।। कभी जड़ी बूटियों और वैध से होता समाज निरोगी था.. आज विज्ञान शिखर पर चढ़ बैठा फिर भी रोगों का फेरा है।। कभी खेतों को पशीनो से हर जन मानव ने तार दिया.. आज शहरों में तकनीकों ने उन महा मानव को मार दिया.. कभी गांव के चौपालों पर सारे मसले हल हो जाते थे.. आज राजनीति में कोर्ट कचहरी और थानों का फेरा है कोई अपनों के लिए कोई अपने लिये कोई दोनों के लिये जीता है.. कोई देता जख्म किसी औरों को कोई अपने आंसू पीता है।। दुनिया वही ज़माना बदला कोई किसी के लिए न मरता है.. जहा देखो बस पैसा है, ये ना तेरा है न मेरा है।। ये दुनिया वही पुरानी है हर रोज नया सवेरा है.. कही लाशों का तमासा है कहीं गिद्धों का डेरा है।।
उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या दाग़ ही देंगे मुझ को दान में क्या मेरी हर बात बे-असर ही रही नक़्स है कुछ मेरे बयान में क्या मुझ को तो कोई टोकता भी नहीं यही होता है ख़ानदान में क्या ख़ुद को जाना जुदा ज़माने से आ गया था मेरे गुमान में क्या बोलते क्यूँ नहीं मेरे हक़ में आबले पड़ गए ज़बान में क्या ख़ामोशी कह रही है कान में क्या आ रहा है मेरे गुमान में क्या दिल कि आते हैं जिस को ध्यान बहुत ख़ुद भी आता है अपने ध्यान में क्या वो मिले तो ये पूछना है मुझे अब भी हूँ मैं तेरे अमान में क्या यूँ जो तकता है आसमान को तू कोई रहता है आसमान में क्या ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या
मैं ढूंढता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता  नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता  नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए  नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता  वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मिरा  किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता  वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे  कि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता  जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ  यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता  खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में  तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता ~अज्ञात