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Showing posts from April, 2021
मिलना और बिछुड़ना दोनों जीवन की मजबूरी है। उतने ही हम पास रहेंगे, जितनी हममें दूरी है। शाखों से फूलों की बिछुड़न फूलों से पंखुड़ियों की आँखों से आँसू की बिछुड़न होंठों से बाँसुरियों की तट से नव लहरों की बिछुड़न पनघट से गागरियों की सागर से बादल की बिछुड़न बादल से बीजुरियों की जंगल जंगल भटकेगा ही जिस मृग पर कस्तूरी है। उतने ही हम पास रहेंगे, जितनी हममें दूरी है।
जीवन क्या है चलता फिरता एक खिलौना है दो आँखों में एक से हँसना एक से रोना है जो जी चाहे वो मिल जाये कब ऐसा होता है हर जीवन जीवन जीने का समझौता है अब तक जो होता आया है वो ही होना है रात अँधेरी भोर सुहानी यही ज़माना है हर चादर में दुख का ताना सुख का बाना है आती साँस को पाना जाती साँस को खोना है
दिख रहा जो , वही अंधेरा है दूर नज़रों से कब सवेरा है! मैल दिल में कोई नहीं रखना  दिल में रब का अगर बसेरा है! छीन लेता है साथ अपनों का  वक़्त वो बे'रहम लूटेरा है! सब मुसाफ़िर हैं एक मंज़िल के  ये जहां तेरा है और न मेरा है! दिख रहा जो, वही अंधेरा है  दूर नज़रों से कब सवेरा है! डॉ फौज़िया नसीम शाद

જાનાં, ઇતના મત સોચા કર

તન્હા તન્હા મત સોચા કર મર જાયેગા, મત સોચા કર પ્યાર ઘડી ભર કા હી બહુત હૈ ઝૂઠા-સચ્ચા, મત સોચા કર જિસકી ફિતરત હી ડસના હો વો તો ડસેગા, મત સોચા કર ખ્વાબ, હકીકત યા આફસાના ક્યા હૈ દુનિયા, મત સોચા કર દુનિયા કે ગમ સાથ હૈ તેરે ખુદ કો તન્હા મત સોચા કર મૂંદ લે આંખે ઔર ચલા ચલ મંઝિલ, રસ્તા, મત સોચા કર જીના દૂભર હો જાએગા જાનાં, ઇતના મત સોચા કર
शाम-ए-ग़म की सहर नहीं होती या हमीं को ख़बर नहीं होती हम ने सब दुख जहां के देखे हैं बेकली इस क़दर नहीं होती चांद है कहकशां है तारे हैं कोई शय नामा-बर नहीं होती़ एक जां-सोज़ ओ ना-मुराद ख़लिश इस तरफ़ है उधर नहीं होती दोस्तो इश्क़ है ख़ता लेकिन क्या ख़ता दरगुज़र नहीं होती रात आ कर गुज़र भी जाती है इक हमारी सहर नहीं होती बे-क़रारी सही नहीं जाती ज़िंदगी मुख़्तसर नहीं होती एक दिन देखने को आ जाते ये मुराद उम्र भर नहीं होती हुस्न सब को ख़ुदा नहीं देता हर किसी की नज़र नहीं होती दिल पियाला नहीं गदाई का आशिक़ी दर-ब-दर नहीं होती

🌹रोज़ा🌹

🌹रोज़ा🌹 मोमिन के लिए ख़ैर का पैग़ाम है रोज़ा  दरअसल ये अल्लाह का इनाम है रोज़ा  आमादा क्या करता है जो नेक अमल पर बदियों से बचाए जो वही काम है रोज़ा  जो रोज़ा रखे उस को ही पुरज़ोर बना दे मोमिन के लिए ताक़त-ए-इसलाम है रोज़ा  ये रोज़ा हकीक़त में एक आसान अमल है लेकिन ये मुसलमान का बड़ा दाम है रोज़ा  है धूप की और प्यास की तकलीफ़ तो लेकिन  ये क्लब़ का और रूह का आराम है रोज़ा  मैं आपको इस रोज़े की तारीफ़ बताऊँ  रमज़ान में एक रौनक़ अय्याम है रोज़ा  आकिफ़ ये दुनिया को बताना है ज़रूरी  जन्नत में जो ले जाए वो अक़दाम है रोज़ा  -Aakif Zayn

Chand sher

कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं कहां दिन गुज़ारा कहां रात की यारो नए मौसम ने ये एहसान किए हैं अब याद मुझे दर्द पुराने नहीं आते चराग़ों को आंखों में महफ़ूज़ रखना बड़ी दूर तक रात ही रात होगी दुआ करो कि ये पौदा सदा हरा ही लगे उदासियों में भी चेहरा खिला खिला ही लगे मुख़ालिफ़त से मिरी शख़्सियत संवरती है मैं दुश्मनों का बड़ा एहतिराम करता हूं ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के दीवाना बे-पढ़े-लिखे मशहूर हो गया

for zeny

[4/16, 5:01 AM] Kk:  हम दोनों का कुछ नाता ही अलग है..! प्यार ओ ख्याल आता ही अलग है..! [4/16, 5:01 AM] Kk:  Connection hai jo ekdum Match hai, jaana_ Dosti to out of Catch hai
हर इबादत-ए-मसरूफ को अमान मुबारक हो हर रूह-ए-ख़िदमत को रमज़ान मुबारक हो  ज़मीं पे अमन कि ख़ातिर मुसलसल इबादत हो ख़ैर-ओ-अमन की दुआ से रमज़ान मुबारक हो  हर आयत के साथ मुकम्मल हों सबकी दुआएं रोज़ा-ए-नमाज़ के असर से ईमान मुबारक हो  पाकीज़गी का परचम फहरे ज़मीन पर हर तरफ कुन के करम से सबको सब्र-ए-कमान मुबारक हो  हर रोज़ गुज़रे सुकून और इबादत के दामन में ख़ुदा के रहम से हर फकीर को शान मुबारक हो
કોઈના પગલામાં ડગ ભરતો નથી હું મને ખુદને અનુસરતો નથી શ્વાસ પર જીવી રહ્યો છું છતાં હું ભરોસો શ્વાસનો કરતો નથી મારે કાયમ એક ચહેરો છે ફકત હું કદી દર્પણને છેતરતો નથી ચાહું તો ખુદને સમેટી પણ શકું હું વધારે પડતો વિસ્તરતો નથી ~ખલીલ

~ખલીલ

જિંદગી, તારાથી હું થાક્યો નથી તું જો થાકી જાય તો  કહે જે મને ~ખલીલ રાખજે ખિસ્સામાં સરનામું ખલીલ છે અકસ્માતો ભયંકર શહેરમાં ~ખલીલ રાતે ચિંતા કે સવારે સૂર્ય કેવો ઊગશે ને સવારે સાંજ પડવાની ફિકર સામે હતી બસ હવે ઊંઘી જવાનું છે ખલીલ તું ન થાક્યો હોય પણ થાકી છે રાત કોઈના પગલામાં ડગ ભરતો નથી હું મને ખુદને અનુસરતો નથી શ્વાસ પર જીવી રહ્યો છું છતાં હું ભરોસો શ્વાસનો કરતો નથી મારે કાયમ એક ચહેરો છે ફકત હું કદી દર્પણને છેતરતો નથી ચાહું તો ખુદને સમેટી પણ શકું હું વધારે પડતો વિસ્તરતો નથી ~ખલીલ