रिश्ते बदलते नहीं...
रिश्ते बदलते नहीं, घर में बहू के आ जाने से घरका बटवारा होता नही, बेटे का प्यार बट जाने से... वैसे तो माँऐ बहुत चेहचिहाती है,बेटे को दूल्हा बनाने को और सास बन जाने को... फिर क्यों बाद में सबसे ज्यादा दुखी नज़र आती है वही माँ घर में अपनी बात मनवाने को... कसूर किसीका दीखता नहीं, अपने सिरहाने ले जाने को, क्या बेटा, क्या बहु, बच्चे भी अपने आप में व्यस्त हो जाते है, माँ कहा जाये अपनी बीती सुनाने को... बहार की रीती सब को दिखती है, घर का भेद बताते नहीं ज़माने को... दूर रहना इन रस्मों से, खुश रहा करो माँ तू भी ज़िन्दगी है जी जाने को...