दिख रहा जो , वही अंधेरा है
दूर नज़रों से कब सवेरा है!

मैल दिल में कोई नहीं रखना 
दिल में रब का अगर बसेरा है!

छीन लेता है साथ अपनों का 
वक़्त वो बे'रहम लूटेरा है!

सब मुसाफ़िर हैं एक मंज़िल के 
ये जहां तेरा है और न मेरा है!

दिख रहा जो, वही अंधेरा है 
दूर नज़रों से कब सवेरा है!

डॉ फौज़िया नसीम शाद

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