में और तुम जैसे

में और तुम जैसे..
समंदर के दो किनारे,
एक होकर भी अलग

में और तुम जैसे..
रेल की दो पटरियां, 
साथ चलकर भी जुदा

में और तुम जैसे..
सिक्के के दो पहलु, 
एक होकर भी भिन्न

में और तुम जैसे..
वो सारे जज़्बात, 
अनकहे अल्फ़ाज़

में और तुम जैसे..
कहानी के वो नाम
जानकर भी जो अंजान

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