Chand sher
कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं
कहां दिन गुज़ारा कहां रात की
यारो नए मौसम ने ये एहसान किए हैं
अब याद मुझे दर्द पुराने नहीं आते
चराग़ों को आंखों में महफ़ूज़ रखना
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी
दुआ करो कि ये पौदा सदा हरा ही लगे
उदासियों में भी चेहरा खिला खिला ही लगे
मुख़ालिफ़त से मिरी शख़्सियत संवरती है
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतिराम करता हूं
ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के
दीवाना बे-पढ़े-लिखे मशहूर हो गया
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