दाग़ ही देंगे मुझ को दान में क्या
मेरी हर बात बे-असर ही रही
नक़्स है कुछ मेरे बयान में क्या
मुझ को तो कोई टोकता भी नहीं
यही होता है ख़ानदान में क्या
ख़ुद को जाना जुदा ज़माने से
आ गया था मेरे गुमान में क्या
बोलते क्यूँ नहीं मेरे हक़ में
आबले पड़ गए ज़बान में क्या
ख़ामोशी कह रही है कान में क्या
आ रहा है मेरे गुमान में क्या
दिल कि आते हैं जिस को ध्यान बहुत
ख़ुद भी आता है अपने ध्यान में क्या
वो मिले तो ये पूछना है मुझे
अब भी हूँ मैं तेरे अमान में क्या
यूँ जो तकता है आसमान को तू
कोई रहता है आसमान में क्या
ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता
एक ही शख़्स था जहान में क्या
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