ये दुनिया वही पुरानी है हर रोज नया सवेरा है..
कही लाशों का तमासा है कहीं गिद्धों का डेरा है।।

कोई चल निकला है मंजिल को पर राहों में अंधेरा है..
कही रोटी छीन गया मेरा कहीं सुना थाली तेरा है।।

कभी जड़ी बूटियों और वैध से होता समाज निरोगी था..
आज विज्ञान शिखर पर चढ़ बैठा फिर भी रोगों का फेरा है।।

कभी खेतों को पशीनो से हर जन मानव ने तार दिया..
आज शहरों में तकनीकों ने उन महा मानव को मार दिया..

कभी गांव के चौपालों पर सारे मसले हल हो जाते थे..
आज राजनीति में कोर्ट कचहरी और थानों का फेरा है

कोई अपनों के लिए कोई अपने लिये कोई दोनों के लिये जीता है..
कोई देता जख्म किसी औरों को कोई अपने आंसू पीता है।।

दुनिया वही ज़माना बदला कोई किसी के लिए न मरता है..
जहा देखो बस पैसा है, ये ना तेरा है न मेरा है।।

ये दुनिया वही पुरानी है हर रोज नया सवेरा है..
कही लाशों का तमासा है कहीं गिद्धों का डेरा है।।

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